(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्रमवासिकपर्व - अध्याय 041


॥ श्रीः ॥
16.15. अध्यायः 015
अथाश्रमवासपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Topics
धृतराष्ट्रेण भीष्मदुर्योधनाद्युद्देश्यकश्राद्धे धनवस्रान्नादिना ब्राह्मणादिसंतर्पणम्॥ 1 ॥
Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

विदुरेणैवमुक्तस्तु धृतराष्ट्रो जनाधिपः।
प्रीतिमानभवद्राजन्राज्ञो जिष्णोश्च कर्मणा॥ 16-15-1(97620)
ततोऽभिरूपान्भीष्माय ब्राह्मणानृषिसत्तमान्।
पुत्रार्थे सुहृदां चैव स समीक्ष्य सहस्रशः॥ 16-15-2(97621)
कारयित्वाऽन्नपानानि यानान्याच्छादनानि च।
सुवर्णमणिरत्नानि दासीदासपरिच्छदान्॥ 16-15-3(97622)
कंबलानि च रत्नानि ग्रामान्क्षेत्रं तथा धनम्।
सालङ्कारान्गजानश्वान्कन्याश्चैव वरस्त्रियः॥ 16-15-4(97623)
आदिश्यादिश्य सर्वेभ्यो ददौ स नृपसत्तमः।
द्रोणं संकीर्त्य भीष्मं च सोमदत्तं च बाह्लिकम्॥ 16-15-5(97624)
दुर्योधनं च राजानं पुत्रांश्चैव पृथक्पृथक्।
जयद्रथपुरोगांश्च सुहृदश्चापि सर्वशः॥ 16-15-6(97625)
स श्राद्धयज्ञो ववृते बहुगोधनदक्षिणः।
अनेकधनरत्नौघो युधिष्ठिरमते तदा॥ 16-15-7(97626)
अनिशं यत्र पुरुषा गणका लेखकास्तदा।
युधिष्ठिरस्य वचनादपृच्छन्त स्म तं नृपम्॥ 16-15-8(97627)
आज्ञापय किमेतेभ्यः प्रदेयं दीयतामिति।
तदुपस्थितमेवात्र वचनान्ते ददुस्तदा॥ 16-15-9(97628)
शते देये दशशतं सहस्रं चायुतं तथा।
दीयते वचनाद्राज्ञः कुन्तीपुत्रस्य धीमतः॥ 16-15-10(97629)
एवं स वसुधाराभिर्वर्षमाणो नृपांबुदः।
तप्रयामास विप्रांस्तान्वर्षन्भूमिमिवांबुदः॥ 16-15-11(97630)
ततोऽन्तन्तरमेवात्र सर्ववर्णान्महामते।
अन्नपानरसौघेण प्लावयामास पार्थिवः॥ 16-15-12(97631)
सवस्त्रधनरत्नौघो मृदङ्गनिनदस्वनः।
गवाश्वमकरावर्तो नानारत्नमहाकरः॥ 16-15-13(97632)
ग्रामाग्रहारद्वीपाढ्यो मणिहेमजलार्णवः।
जगत्संप्लावयामास धृतराष्ट्रोडुपोद्धतः॥ 16-15-14(97633)
एवं स पुत्रपौत्राणां पितॄणामात्मनस्तथा।
गान्धार्याश्च महाराज प्रददावौर्द्वदेहिकम्॥ 16-15-15(97634)
परिश्रान्तो यदासीत्स ददद्दानान्यनेकशः।
निवर्तयामास तदा दानयज्ञं नराधिपः॥ 16-15-16(97635)
एवं स राजा कौरव्यश्चक्रे दानमहाक्रतुम्।
नटनर्तकलास्याढ्यं बह्वन्नरसदक्षिणम्॥ 16-15-17(97636)
दशाहमेवं दानानि दत्त्वा राजांऽबिकासुतः।
बभूव पुत्रपौत्राणामनृणो भरतर्षभ॥ ॥ 16-15-18(97637)

इति श्रीमन्महाभारते आश्रमवासिकपर्वणि आश्रमवासपर्वणि पञ्चदशोऽध्यायः॥ 15 ॥

Mahabharata - AshramaVasika Parva - Chapter Footnotes
7-15-13 सवस्त्रफेनरतौघ इति क.थ.पाठः॥


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